बहादुरी/साहस के किस्से

छोटी उदारता एक लंबा रास्ता तय करती है

राजू, आठ वर्ष का बच्चा है जो अपने कई चचेरे भाइयों के साथ, हर दिन कई बुराइयों और अपमान से जूझता है। वह खुद को गरीबी के चंगुल से मुक्त करने के लिए संघर्ष करता है, वह भी स्वास्थ्यकर भोजन की उम्मीद रखता है, और इस स्थित से मुक्त होने के लिए शिक्षा के सपने देखता है। वे सभी बच्चे हैं, हमारा भविष्य है और हमारे भविष्य की स्थिति इतनी निराशाजनक नहीं होनी चाहिए ।

हो सकता है कि उनके पास अतीत की खूबसूरत यादें न हों, लेकिन हमारी तरह उन्हें भी अपना भविष्य बनाने का मौका प्रदान किया जा सकता है।

खींवसर फाउंडेशन में, हम राजू जैसे लोगों की मदद कर रहे हैं, ताकि भविष्य में उनकी स्थिति में सुधार हो सके। हमारी मदद करें।

हमारी मदद करें, उसकी मदद करें, हमारे भविष्य को आकार दें!

जहां डर होता है वहाँ कमजोरी होती है

इंद्रा एक घुमंतू (जिप्सी) है, जिसे आमतौर पर बंजारा के नाम से जाना जाता है। वह एक गृहिणी के रूप में एक सामान्य जीवन जीना चाहती है। लेकिन इंद्रा के साथ लंबे समय तक बातचीत करने से पता चला कि उसके लिए जीवन क्या है और कैसे वह खुद ही सभी बाधाओं को दूर करती रही है।

वह घर चलाती है, रोजी – रोटी कमाती है, अपने बच्चों की परवरिश करती है, और घर के दैनिक कामों को बहुत कम या बिना किसी सहारे के करती है। अशिक्षित होने के बावजूद उनका जिंदा रहने का जज्बा, और वह भी मर्यादा के साथ, काबिले तारीफ है। उसने दो जून की रोटी के लिए हस्तशिल्प बेचना शुरू कर दिया था और फिर महामारी हो गई।

महामारी ने उसे उतना ही विनाशकारी रूप से मारा जितना उसने दुनिया को मारा।

लोगों ने डर के मारे बाजारों में आना छोड़ दिया, और उसके माल की बिक्री बंद हो गई। नतीजतन, उसकी दुनिया में एक ठहराव आ गया।

पैसे के लिए उसका संघर्ष और अपने बच्चों को नहीं खिलाने का अपराधबोध उस पर बहुत भारी था।

बिना किसी बचत और किसी भी कोने से किसी भी तरह की सहायता ना मिलने से मजबूत व्यक्ति भी टूट जाता है, और यहाँ वह इसका मुकाबला अदम्य साहस और बहादुरी से कर रही है।

उसे अपने पैरों पर खड़ा करने में मदद के लिए हमारी मदद करें।

आपकी मदद अत्यंत सराहनीय होगी!

दुख के आंसुओ को पोंछकर जीने की इच्छा जगाना

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ईश्वर के आशीर्वाद से ममता की एक सुन्दर कन्या है। लेकिन दुर्भाग्य से परिस्थितिवश वह सम्मानजनक तरीके से अपनी कन्या का पालन पोषण करने में असमर्थ है। इसके अलावा, वह अपने पति की मानसिक बीमारी से भी लड़ रही जिससे उसका जीवन और अधिक संघर्षपूर्ण हो गया है।

ममता एक ऐसी महिला है जो कभी भी किराने का समान आदि खरीदने के लिए किसी भी दुकान पर नहीं गई उसका गुजारा हमेशा उसके पड़ोसियों से प्राप्त भोजन और कपड़ों से होता रहा, जो उसकी मदद करने के लिए काफी दयालु हैं।

वह सरकार के श्रम रोजगार के अंतर्गत आने वाली योजनाओं में काम करना चाहती है लेकिन इससे भी उसकी परेशानियाँ कम नहीं हुई, क्योंकि इसके लिए उसे अपने बच्चे को, असुरक्षित और अकेला छोड़कर जाना पड़ता है।

जहाँ हम टॉयलेट पेपर खत्म हो जाने से ही बहुत परेशान हो जाते हैं वहीं यह महिला है जिसके पास ना तो शौचालय और स्वच्छता की सुविधाये हैं और ना ही कोई सुरक्षा। इसलिए उसकी मदद करने के लिए, हमने ममता को हर महीने जरूरी किराने का सामान उपलब्ध कराने और उसकी बेटी को स्कूल भेजने का फैसला किया है।

ममता जैसी महिलाओं की मदद के लिए योगदान दें।

जीवन या जीविका प्रदान करना

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जैसा कि हमने घर में लोहे की जाली का गेट लगाया है जिसे देखकर हमें ऐसा लगता है कि यह गेट इतना कमजोर है कि यह पेड़ पौधों की पत्तियों को अंदर आने से रोकने के सिवाय हमें कोई सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकता है।

हम वहां एक ऐसे व्यक्ति से मिले जिसने एक दुर्घटना में अपना जवान बेटा खो दिया था। दुर्घटना ने परिवार को झकझोर कर रख दिया, और उस व्यक्ति की बहू इस घटना से विक्षिप्त होकर मानसिक रूप से बीमार हो गई। झूमा राम इस दुःख और चिंता के कारण व्याकुल और परेशान था। बेटे की मृत्यु के बाद उस पर अपने 3 पोते-पोतियों के साथ, एक मानसिक रूप से बीमार बहू, और दुख से टूटी हुई पत्नी की जिम्मेदारी थी, उसका जीवन रूक गया।

लेकिन, अपने बेटे का शरीर राख में मिल जाने से पहले ही उसे अपने साथ- साथ छह लोगों के परिवार का पालन करने के लिए धन कमाने की चिंता सताने लगी।

झूमा राम वर्तमान में अपनी चाक से मिट्टी के घड़े और मिट्टी के बर्तन बनाकर अपनी रोजी- रोटी चलाते हैं। यह बहुत ही थकाऊ काम है जिसके कारण उन्हे गठिया हो गया।

उन्हें मिट्टी के बर्तन बनाने के अलावा कोई काम नहीं आता है, और शायद वे ऐसे आखिरी व्यक्ति है जो परंपरागत चाक पर अपने हाथ से मिट्टी के बर्तन और अन्य वस्तुओं का विनिर्माण करते हैं।

हमने झूमा राम की सहायता करने का निर्णय लिया है, ताकि उनके जीवन का चक्र चलता रहे।

कृपया झूमा राम जैसे लोगों की सहायता के लिए हमारी मदद करें ।

खबर लेने में बहुत देर हो चुकी है

चार बच्चे – युवराज, आनंद, मूमल और वीरा के पिता की मृत्यु हो चुकी है और परिवार में एकमात्र जीवित पुरुष उनके दादाजी हैं, जो 90 साल के हैं जिनके पास परिवार चलाने के लिए कोई नौकरी या व्यवसाय का सहारा नहीं है। युवराज और उसके भाई-बहन स्कूल, नए कपड़े, खिलौने या कोई ऐसी खुशी नहीं मांग सकते जिसकी मांग हर बच्चा करता है। सात लोगों का यह परिवार झोपड़ी में रहता है जिसकी छत आंधी, तूफान और तेज रेतीली हवाओं के कारण उड़ जाती है।

युवराज कहता है, “मैं स्थिति को समझता हूं, लेकिन मेरे भाई और बहन अक्सर मुझसे यह सवाल करते हैं कि “हम साइकिल की सवारी क्यों नहीं कर सकते या स्कूल क्यों नहीं जा सकते या हमें नए कपड़े क्यों नहीं मिल सकते,” “हम अन्य बच्चों की तरह कैंडी क्यों नहीं खरीद सकते, ” हमें स्वच्छ पानी क्यों नहीं मिलता है ”आदि?

हम युवराज को ऐसे सवालों से बचाने की कोशिश कर रहे हैं।

युवराज जैसे बच्चों की सहायता के लिए कृपया मदद का हाथ बढ़ाएं।

पूजा का कभी न खत्म होने वाला संघर्ष

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जीवन का 16 वां वर्ष हर किसी के लिए खुशी देने वाला नहीं होता है। पूजा जैसे लोग, जिनकी उम्र जीवन का आनंद लेने की और नई खोज करने की है, अपनी रोजी रोटी के लिए मजदूरी करती है। पूजा खुद स्कूल नहीं जाती थी, लेकिन वह इसलिए कड़ी मेहनत कर रही है कि उसके भाई-बहन स्कूल जरूर जाएं और शिक्षित और आत्मनिर्भर बनें। पूजा किसी निर्माण स्थल पर मजदूरी करके किसी तरह रोज 150 रुपये कमा पाती है जो उसके द्वारा दिनभर किए जाने वाले कड़ी मेहनत के हिसाब से बहुत कम है। उसके सपने और आकांक्षाएं अब उसकी प्राथमिकता नहीं रही और उसे केवल एक बात की चिंता है कि वह परिवार का पालन पोषण कैसे करे।

पूजा को कोई भी कार्य सीखने में अत्यधिक रुचि है और वह दुनिया को दिखा देना चाहती है कि उसमें अपने कौशल को बढ़ाने और उत्तम सेवा प्रदान करने की कितनी अधिक उत्कृष्ट इच्छा है।

वह वास्तव में क्या चाहती है वह किसी कार्य में व्यावसायिक प्रशिक्षण चाहती है। उदाहरण के लिए, पूजा कहती है, “मैं” सोलर पैनल बनाने का काम सीखना चाहती हूँ। वह आगे कहती है “मैंने कुछ लोगों से इसके बारे में सुना था जब में पास के शहर में किराने का सामान खरीदने के लिए गई थी। काश मैं वह सीख पाती, लेकिन इसके लिए बहुत सारे पैसे की आवश्यकता है जो मेरे पास नहीं हैं।”

पूजा को उसकी फीस भरने में मदद करें जिससे वह अपना सपना पूरा कर सके!

दुर्गा को मदद चाहिए

दुर्गा अपने पारिवारिक दुखों से जूझ रही है और गांव में अपने बच्चों का भरण पोषण के लिए संघर्ष भी कर रही है। यह गांव थार रेगिस्तान में है, जहां साफ पानी, शिक्षा, भोजन या यहां तक कि आय का कोई नियमित स्रोत जैसे संसाधनों की कमी है। दुर्गा ने अपने पति के साथ- साथ बेहतर जीवन की आशा भी खो चुकी है। वह बताती है कि जब उसे अपने पति के बारे में पता चला तो उसने महसूस किया कि उसे कितनी बड़ी क्षति पहुंची है, अब उसके सामने अपने बच्चों का पालन पोषण अकेले करने के साथ स्वयं का गुजारा करने की बहुत बड़ी और तकलीफदेह जिम्मेदारी है।

वह काम खोजने, परिवार चलाने और आजीविका का प्रबंध करने के लिए कड़ी मेहनत कर रही है, लेकिन वह पढ़ी लिखी नहीं है हर बार उसकी कोशिश नाकाम हो जाती है।

हमने उसे खींवसर फाउंडेशन कार्यक्रम का हिस्सा बनाने का फैसला किया है जहां हम विधवाओं को गोद लेते हैं और उन्हें हर महीने किराने का सामान उपलब्ध कराते हैं।

हमें खुशी होगी अगर आप दुर्गा जैसी महिलाओं की मदद के लिए अपना योगदान करते हैं ।

सोहनी की चिंता

सोहनी देवी अपने पति और तीन बच्चों के साथ झोपड़ी में रहती है। वह घर की एक मात्र कमाने वाली सदस्य है, और उसे इसी से अपने परिवार का गुजारा करना पड़ता है। उसे अपने मानसिक रूप से विक्षिप्त पति और अपने 3 मासूम बच्चों के भविष्य की चिंता लगातार खाए जा रही है। उसे हमेशा यह डर सताये रहता है कि कहीं उसका मानसिक रूप से विक्षिप्त पति आधी रात में उसे छोड़कर रेगिस्तान में ना चला जाए।

वह कहती हैं, “मेरा सपना परिवार के साथ आदर्श जीवन जीने का है, लेकिन जब से मेरे पति ने होश खो दिया है, मैं अवसाद के अंधेरे में घिरी रहती हूँ और अपने बच्चों की परवरिश की चिंता करती हूं; मैं हमेशा उन्हें खिलाने और उन्हें स्कूल भेजने के बारे में सोचती हूं। हमने उसे खींवसर फाउंडेशन कार्यक्रम का हिस्सा बनाने का फैसला किया है जहां हम विधवाओं की मदद करते हैं और उन्हें हर महीने किराने का सामान उपलब्ध कराते हैं।

सोहनी जैसी महिलाओं की चिंताओं को खत्म करने में हमारी मदद करें।

शारदा के आंसू और डर

शारदा के पति का कुछ साल पहले निधन हो गया था। उसके पास कोई शिक्षा या आय का स्रोत नहीं है, जिसके कारण उसका जीना बहुत कठिन हो गया है।

उसके बच्चों को शिक्षा और पहनने के लिए कपड़ों की जरूरत है, वह उनके लिए भोजन और साफ पानी की व्यवस्था करने के लिए संघर्ष कर रही है।

शारदा कहती हैं, मुझे कुछ नहीं चाहिए। मुझे अच्छी जिंदगी नहीं चाहिए। मैं यह नहीं जानती कि “अच्छा” शब्द का कोई अर्थ भी होता है। मैं अपने लिए आय का एक नियमित स्रोत चाहती हूँ जिससे मेरे बच्चों का भविष्य सुनिश्चित हो सके।

हमने शारदा जैसी महिलाओं की मदद करने का फैसला किया है और आपका सहयोग अत्यंत सराहनीय होगा।

अमली का अकेलापन

अमली ने अपनी जिंदगी में सबको खो दिया। उसके पति, उसका बेटा, उसके सपने, और सचमुच सब कुछ। वह पूरे समय संघर्ष कर रही है, और उसे अपने बल पर जिंदगी को दुबारा पटरी पर ला पाना कठिन हो गया है।

नियमित रूप से खाना ना खा पाने तथा भोजन और साफ पानी ना मिल पाने के कारण वह मानसिक परेशानी का सामना कर रही है।

हर बार जब कोई उसके पास आता है, तो उसे उम्मीद होती है कि उसका बेटा और पति उसके पास लौट आएंगे। फिर भी, उसके लिए स्थिति को स्वीकार कर पाना अभी भी चुनौतीपूर्ण है।

उसके दुखों को कम करने के लिए, हमने उसके जीवन की बुनियादी आवश्यकता को पूरा करने का फैसला किया है। आपका योगदान अत्यंत सराहनीय होगा।

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यदि हमारे पास कोई विकल्प होता, तो हम सभी अपने आस-पास मौजूद विभिन्न सामाजिक मुद्दों से अनभिज्ञ होते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है क्योंकि हम यह जानते हैं कि ये मामले हमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी न किसी तरीके से प्रभावित करते हैं। अक्सर, हम एक समाज के रूप में गरीबों, वंचितों के मुद्दों पर ध्यान नहीं देते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि हमें परिस्थितियों के परिणाम प्रत्यक्ष रूप से भुगतने नहीं पड़ते हैं और यह भी क्योंकि हम भी अपने जीवन में होने वाले उथल-पुथल और कठिनाइयों से घिरे हुए हैं ।

अब समय आ गया है कि हम उन लोगों के साथ सहानुभूति रखना शुरू करें जो जीवन में अन्य लोगों की तरह भाग्यशाली नहीं हैं और उनका जीवन सरल बनाने में मदद करें जिससे उनके मन में जीने की आशा उत्पन्न हो सके। आपका योगदान हमारे लिए मूल्यवान है। याद रखें, इसके लिए दिया जाने वाला एक-एक पैसा महत्वपूर्ण है। हमें विश्वास है कि इस सबका उद्देश्य मानवता के प्रति दया भावना रखना और किसी जरूरतमंद इंसान की मदद करने के महान कार्य में योगदान करना है।